Thursday, May 19, 2016

ग़ज़ल का साज़ उठाओ, बड़ी उदास है रात...

/ Strains of melancholia by Jigar Muradabadi, Vinod Sehgal /

तबीयत इन दिनों बेगाना-ए-ग़म होती जाती है
मेरे हिस्से की गोया हर ख़ुशी कम होती जाती है

क़यामत क्या ये ऐ हुस्न-ए-दो-आलम होती जाती है
कि महफ़िल तो वही है दिल-कशी कम होती जाती है

वही हैं शाहिद ओ साक़ी मगर दिल बुझता जाता है
वही है शम्अ लेकिन रौशनी कम होती जाती है

वही मय-खाना ओ सहबा वही साग़र वही शीशा
मगर आवाज़-ए-नोशा-नोश मद्धम होती जाती है

वही है ज़िन्दगी लेकिन 'जिगर' ये हाल है अपना
कि जैसे ज़िन्दगी से ज़िन्दगी कम होती जाती है
*हुस्न-ए-दो-आलम : beauty of both worlds | *सहबा : wine
*शाहिद ओ साक़ी : wine bearer | *साग़र : goblet
*आवाज़-ए-नोशा-नोश मद्धम : cheers/ toast

[ From the album Kahkashaan ]

The elusive singer Vinod Sehgal at his absolute best, in this deeply moving meditation on melancholia, depression and everything else. Almost an automatic choice for me, whenever I feel down, feeling hopeless with the world and its inability to be even a tad just, equitable for everyone.

Have listened very little of Vinod Sehgal, but the manner in which he expresses "'Qayamat kya ai-husn-e-do-aalam hoti jaati hai ?..." Uff!!

By the way, the title is a misra by Firaq Girakhpuri.

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