Thursday, April 3, 2014

'Reading' through the Ghalib glass

( Courtesy : Vishi Sinha )


"कब किताब पढ़ते हो?"
"ग़ालिब छूटी पढ़ाई, पर अब भी कभी कभी,
पढ़ता हूँ रोज़-ए-अब्र-ओ-शब-ए-माहताब में."

"कौन सी पढ़ते हो?"
"अच्छी पढ़ ली खराब पढ़ ली, जैसी मिली क़िताब पढ़ ली."

"क्यों पढ़ते हो?"
"पढ़ता हूँ इसलिए कि कट जाए ज़िन्दगानी मेरी, वर्ना किसी शौक़ की ख़ातिर तो मैं नहीं पढ़ता."

"कितनी पढ़ते हो?"
"वैसे कभी पोथी नहीं काफी, कभी इक फ़िकरा बहुत है."

"कैसे और कहाँ पढ़ते हो?"
"कभी अल्फ्रेड पार्क में था मुक़ाम ,
तो कभी गंगा - जमुना तीरे,
कभी ट्रिपल आईटी लैब
तो कभी छत के कोने में.
आजकल फ़ुर्सत नहीं मिलती
ग़म-ए-रोजगार से
तो पायी है पनाह
मोबाइल की छोटी स्क्रीन में."

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